रामानंद सागर की श्री कृष्ण भाग 82: अर्जुन की भेदी मछली की आंख और पाण्डवों का हस्तिनापुर आगमन 🏹
देखिए रामानंद सागर द्वारा निर्मित श्री कृष्ण की कथा का खंड 82, जिसमें अर्जुन ने भेदी मछली की आंख का रहस्य जाना और पाण्डवों का हस्तिनापुर आगमन का महत्वपूर्ण दृश्य। साथ ही, जानिए नवीन भज गोविन्दम गीत का आनंद।

Tilak
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_________________________________________________________________________________________________ बजरंग बाण | पाठ करै बजरंग बाण की हनुमत रक्षा करै प्राण की | जय श्री हनुमान | तिलक प्रस्तुति 🙏
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Ramanand Sagar's Shree Krishna Episode 82 - Arjun Ne Bhedi Machli Ki Aankh. Pandavon Ka Hastinapur Aagman.
पांचाल राज्य का राजा द्रुपद अपनी राजसभा में बाल्यकाल के मित्र द्रोण को अपनी बराबरी का न बताकर उनका अपमान करता है। द्रोण पाण्डु पुत्रों के गुरु बनते हैं और गुरुदक्षिणा में राजा द्रुपद को बन्दी बनाकर लाने को कहते हैं। अर्जुन युद्ध में द्रुपद को हराते हैं और उसे द्रोणाचार्य के समक्ष लाकर खड़ा कर देते हैं। द्रोण द्रुपद से कहते हैं कि मैं तुम्हारा हारा हुआ आधा राज्य लेता हूँ और बाकी का आधा राज्य तुम्हें लौटा देता हूँ। इससे मेरी हैसियत तुम्हारे बराबर की हो जाती है। इस घटना से आहत द्रुपद दो ब्रह्मर्षियों याज और उपयाज के आश्रम में पहुँचता है और उनसे विनती करता है कि मुझे सन्तान यज्ञ के द्वारा दो सन्ताने हों। एक पुत्र जो द्रोण का वध कर सके और दूसरी कन्या जिसका विवाह मैं अर्जुन जैसे श्रेष्ठ धनुर्धर से कर सकूँ। ब्रह्मर्षियों के यज्ञ करने से द्रुपद की दोनों इच्छाएं पूरी होती हैं। उसे यज्ञ कुण्ड से तेजस्वी पुत्र धृष्टद्युम्न और दिव्य कन्या द्रौपदी की प्राप्ति होती है। राजकुल की रीति के अनुसार पांचाल नरेश द्रुपद पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर रचाता है। इस स्वयंवर में पांचो पाण्डव भी ब्राह्मण वेश में जाते हैं। द्रुपद ने विशेष आमंत्रण पर श्रीकृष्ण और बलराम भी पहुँचते हैं। पांचाल राजकुमार धृष्टद्युम्न स्वयंवर की शर्त बताता है कि एक घूमते चक्र के उपर छत से लटकती हुई एक मछली है। नीचे पांच बाण रखे हैं। इन बाणों से मछली की आँख को भेदना है। किन्तु बाण का संधान नीचे रखे तेल के कढ़ाव में मछली की परछाई देखकर करना है। दुर्योधन, जरासंध, शिशुपाल, दुर्योधन का छोटा भाई दुःशासन, राजा केकीतान, राजकुमार विकर्ण व कई अन्य सम्राट शर्त पूरी नहीं कर पाते। केवल कर्ण धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने में सफल होता है किन्तु इसके पहले कि वह बाण का संधान करता, द्रौपदी अपने स्थान पर खड़े होकर कहती हैं कि क्षत्रिय राजाओं, ब्राह्मणों और सम्राटों से भरी इस सभा में मैं एक सूतपुत्र से विवाह करने से इनकार करती हूँ। कर्ण यहाँ अपनी वीरोचित महानता का परिचय देता है और कहता है कि विवाह आपसी सहमति से होता है। यदि द्रौपदी मुझसे विवाह नहीं करना चाहती है तो मैं इस स्वयंवर से अलग होता हूँ। इसके बाद श्रीकृष्ण का संकेत पाकर ब्राह्मण वेशधारी अर्जुन धनुष उठाते हैं और तेल के कढ़ाव में परछाईं देखकर मछली की आँख भेद देते हैं। द्रौपदी अर्जुन को वरमाला पहनाती हैं। इससे तिलमिला कर जरासंध अन्य राजाओं से कहता है कि यदि यह कन्या किसी क्षत्रिय राजा का वरण नहीं करती है तो इसे यहीं जिन्दा जला दो। तमाम क्षत्रिय राजा अर्जुन को भी मारने के लिये अपनी तलवारें खींच लेते हैं। परिस्थिति को देखते हुए युधिष्ठिर निर्णय लेते हैं कि पांचो भाईयों का वहाँ रुकना उचित नहीं रहेगा। वह भीम को अर्जुन की रक्षा के लिये वहाँ छोड़ते है और नकुल, सहदेव को लेकर निकल जाते हैं। श्रीकृष्ण राजाओं को चेतावनी देते हुए कहते हैं कि इस ब्राह्मण कुमार ने अपने बाहुबल से इस कन्या को जीता है। अब अगर कोई भी एक कदम आगे बढ़ा तो उसे पहले हमसे युद्ध करना पड़ेगा। उनके रौद्र रूप को देखकर सभी राजा वहाँ से चले जाने में ही अपनी भलाई समझते हैं। द्रौपदी श्रीकृष्ण के चरण स्पर्श करते हुए कहती है कि हे केशव, आपने हमारी प्राण रक्षा की है। इसके लिये मैं जीवन भर आपकी आभारी रहूँगी। श्रीकृष्ण उसे उठाते हुए कहते हैं कि पांचाली, आज से तुम्हें मैं अपनी छोटी बहन मानता हूँ और वचन देता हॅू कि जिस क्षण मुझे याद करोगी, अपने पास पाओगी। श्रीकृष्ण द्रौपदी को अर्जुन के साथ विदा करते हैं। उनके जाने के बाद राजा द्रुपद को श्रीकृष्ण से पता चलता है कि उनकी पुत्री से विवाह करने वाला कोई और नहीं, स्वयं अर्जुन है, वह बहुत प्रसन्न होता है। इसके बाद पाण्डवों के जीवित होने की बात घर-घर फैल जाती है। हस्तिनापुर में महामंत्री विदुर यह जानकारी महाराज धृतराष्ट्र और महारानी गांधारी को देते हैं। वे दोनों पाण्डवों के विवाह की बात सुनकर प्रसन्न होते हैं और पुत्रवधू समेत कुन्ती व पाण्डवों को हस्तिनापुर आने का न्यौता भेजते हैं। हस्तिनापुर अपनी नयी रानी द्रौपदी का उत्साहपूर्व स्वागत करता है। महाराज धृतराष्ट्र से औपचारिक भेंट के बाद श्रीकृष्ण उनसे कहते हैं कि अब पाण्डव सुरक्षित हैं तो उन्हें सत्ता में भागीदारी दे देनी चाहिये। धृतराष्ट्र श्रीकृष्ण की बात का मर्म समझ नहीं पाते तो पांचाल राजकुमार धृष्टद्युम्न स्पष्ट शब्दों में हस्तिनापुर को पाण्डवों और कौरवों के बीच बराबर-बराबर भागों में बाँटने की माँग उठा देता है। इस पर धृतराष्ट्र उपहास पूर्वक कहता है कि तो पांचाल के राजकुमार हमारे राज्य का बँटवारा कराने आये हैं।
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पांचाल राज्य का राजा द्रुपद अपनी राजसभा में बाल्यकाल के मित्र द्रोण को अपनी बराबरी का न बताकर उनका अपमान करता है। द्रोण पाण्डु पुत्रों के गुरु बनते हैं और गुरुदक्षिणा में राजा द्रुपद को बन्दी बनाकर लाने को कहते हैं। अर्जुन युद्ध में द्रुपद को हराते हैं और उसे द्रोणाचार्य के समक्ष लाकर खड़ा कर देते हैं। द्रोण द्रुपद से कहते हैं कि मैं तुम्हारा हारा हुआ आधा राज्य लेता हूँ और बाकी का आधा राज्य तुम्हें लौटा देता हूँ। इससे मेरी हैसियत तुम्हारे बराबर की हो जाती है। इस घटना से आहत द्रुपद दो ब्रह्मर्षियों याज और उपयाज के आश्रम में पहुँचता है और उनसे विनती करता है कि मुझे सन्तान यज्ञ के द्वारा दो सन्ताने हों। एक पुत्र जो द्रोण का वध कर सके और दूसरी कन्या जिसका विवाह मैं अर्जुन जैसे श्रेष्ठ धनुर्धर से कर सकूँ। ब्रह्मर्षियों के यज्ञ करने से द्रुपद की दोनों इच्छाएं पूरी होती हैं। उसे यज्ञ कुण्ड से तेजस्वी पुत्र धृष्टद्युम्न और दिव्य कन्या द्रौपदी की प्राप्ति होती है। राजकुल की रीति के अनुसार पांचाल नरेश द्रुपद पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर रचाता है। इस स्वयंवर में पांचो पाण्डव भी ब्राह्मण वेश में जाते हैं। द्रुपद ने विशेष आमंत्रण पर श्रीकृष्ण और बलराम भी पहुँचते हैं। पांचाल राजकुमार धृष्टद्युम्न स्वयंवर की शर्त बताता है कि एक घूमते चक्र के उपर छत से लटकती हुई एक मछली है। नीचे पांच बाण रखे हैं। इन बाणों से मछली की आँख को भेदना है। किन्तु बाण का संधान नीचे रखे तेल के कढ़ाव में मछली की परछाई देखकर करना है। दुर्योधन, जरासंध, शिशुपाल, दुर्योधन का छोटा भाई दुःशासन, राजा केकीतान, राजकुमार विकर्ण व कई अन्य सम्राट शर्त पूरी नहीं कर पाते। केवल कर्ण धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने में सफल होता है किन्तु इसके पहले कि वह बाण का संधान करता, द्रौपदी अपने स्थान पर खड़े होकर कहती हैं कि क्षत्रिय राजाओं, ब्राह्मणों और सम्राटों से भरी इस सभा में मैं एक सूतपुत्र से विवाह करने से इनकार करती हूँ। कर्ण यहाँ अपनी वीरोचित महानता का परिचय देता है और कहता है कि विवाह आपसी सहमति से होता है। यदि द्रौपदी मुझसे विवाह नहीं करना चाहती है तो मैं इस स्वयंवर से अलग होता हूँ। इसके बाद श्रीकृष्ण का संकेत पाकर ब्राह्मण वेशधारी अर्जुन धनुष उठाते हैं और तेल के कढ़ाव में परछाईं देखकर मछली की आँख भेद देते हैं। द्रौपदी अर्जुन को वरमाला पहनाती हैं। इससे तिलमिला कर जरासंध अन्य राजाओं से कहता है कि यदि यह कन्या किसी क्षत्रिय राजा का वरण नहीं करती है तो इसे यहीं जिन्दा जला दो। तमाम क्षत्रिय राजा अर्जुन को भी मारने के लिये अपनी तलवारें खींच लेते हैं। परिस्थिति को देखते हुए युधिष्ठिर निर्णय लेते हैं कि पांचो भाईयों का वहाँ रुकना उचित नहीं रहेगा। वह भीम को अर्जुन की रक्षा के लिये वहाँ छोड़ते है और नकुल, सहदेव को लेकर निकल जाते हैं। श्रीकृष्ण राजाओं को चेतावनी देते हुए कहते हैं कि इस ब्राह्मण कुमार ने अपने बाहुबल से इस कन्या को जीता है। अब अगर कोई भी एक कदम आगे बढ़ा तो उसे पहले हमसे युद्ध करना पड़ेगा। उनके रौद्र रूप को देखकर सभी राजा वहाँ से चले जाने में ही अपनी भलाई समझते हैं। द्रौपदी श्रीकृष्ण के चरण स्पर्श करते हुए कहती है कि हे केशव, आपने हमारी प्राण रक्षा की है। इसके लिये मैं जीवन भर आपकी आभारी रहूँगी। श्रीकृष्ण उसे उठाते हुए कहते हैं कि पांचाली, आज से तुम्हें मैं अपनी छोटी बहन मानता हूँ और वचन देता हॅू कि जिस क्षण मुझे याद करोगी, अपने पास पाओगी। श्रीकृष्ण द्रौपदी को अर्जुन के साथ विदा करते हैं। उनके जाने के बाद राजा द्रुपद को श्रीकृष्ण से पता चलता है कि उनकी पुत्री से विवाह करने वाला कोई और नहीं, स्वयं अर्जुन है, वह बहुत प्रसन्न होता है। इसके बाद पाण्डवों के जीवित होने की बात घर-घर फैल जाती है। हस्तिनापुर में महामंत्री विदुर यह जानकारी महाराज धृतराष्ट्र और महारानी गांधारी को देते हैं। वे दोनों पाण्डवों के विवाह की बात सुनकर प्रसन्न होते हैं और पुत्रवधू समेत कुन्ती व पाण्डवों को हस्तिनापुर आने का न्यौता भेजते हैं। हस्तिनापुर अपनी नयी रानी द्रौपदी का उत्साहपूर्व स्वागत करता है। महाराज धृतराष्ट्र से औपचारिक भेंट के बाद श्रीकृष्ण उनसे कहते हैं कि अब पाण्डव सुरक्षित हैं तो उन्हें सत्ता में भागीदारी दे देनी चाहिये। धृतराष्ट्र श्रीकृष्ण की बात का मर्म समझ नहीं पाते तो पांचाल राजकुमार धृष्टद्युम्न स्पष्ट शब्दों में हस्तिनापुर को पाण्डवों और कौरवों के बीच बराबर-बराबर भागों में बाँटने की माँग उठा देता है। इस पर धृतराष्ट्र उपहास पूर्वक कहता है कि तो पांचाल के राजकुमार हमारे राज्य का बँटवारा कराने आये हैं।
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Duration
46:41
Published
Dec 25, 2020
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